Saturday, 4 February 2012

“दुविधा”- ब्लॉग की, उसकी शुरुआत की और शीर्षक की  .............
एक दिन ऐसे ही घर में बैठे बैठे बोर हो रहा था तो इन्टरनेट पर कुछ ब्लोग्स पड़ने का ख्याल आया, फिर हिंदी के कुछ अच्छे ब्लोग्स नजर आए तो प्रोफेसनल कंपनी सेक्रेटरी की काया में बसे मन के एक कोने में पड़े लेखक  ने कोहनिया मारना शुरू कर दिया. “तुम भी तो लिखते थे कभी .....? क्यों नहीं फिर से शुरू करते हो...?”  मैंने कहा-  “समय कहाँ है ...? वो तो बस यूँ ही कभी इस दौड में दौड़ते दौड़ते थक जाता हूँ तो सुकून पाने की आस में यहाँ वहाँ भटकता हुआ कुछ पड़ लिख लेता हूँ.” फिर उसने कहा- “समय तो खूब है तुम्हारे पास उसका सही इस्तेमाल नहीं करना चाहते ....सात बजे से लेकर नौ बजे तक बैक टू बैक टीवी देखने का समय कहाँ से निकल आता है...?” बात में दम नजर आया, तो निश्चय किया की कुछ लिखा जाये. कैसे या किस माध्यम में लिखा जाये, तो उत्तर सामने था – ब्लॉग.
ब्लॉग शुरू करने का निर्णय अपने आप में किसी दुविधा से कम न था ..... कई सारे सवाल, कई शंकाए जैसे ब्लॉग क्यों, किसके लिए, क्या लिखोगे, कौन पड़ेगा ये सब, इससे क्या मिलने वाला है, व्यर्थ में समय की बर्बादी, इतने सारे ब्लॉग है तुम एक और लिखने लगोगे तो क्या हो जायेगा, वगैरह वगैरह. इन सब के अलावा एक और दुबिधा थी – वो थी भाषा की, किस भाषा में लिखोगे? हिंदी भाषी प्रदेश से आने के कारण मेरे लिए हिंदी में अभिव्यक्त करना सहज है, दिल्ली में आने से पहले तक हिंदी में ही लिखने की कोशिश करता रहा था.....लेकिन पिछले १३-१४ वर्षों में जबसे मैंने कंपनी सचिव के प्रोफेसन में प्रवेश किया है हिंदी लिखने का अभ्यास न के बराबर हो गया है, वो तो भला हो कि मैं इफको में नौकरी पा गया नहीं तो अभी तक तो मैं हिंदी बोलने का अभ्यास भी खो चुका होता...... फिर विचार किया कि मैं आज भी कितनी ही अंग्रेजी क्यों न पड़ लिख लिया होऊ हिंदी में ही अपनापन महसूस करता हूँ. हिंदी में मैं खुद को खुद सा महसूस कर पता हूँ,  सो अंत में निर्णय लिया कि हिंदी में ही लिखा जाये ... जब कभी जरुरत लगी तो अंग्रेजी में भी लिखूंगा... अभी से विकल्पों को सीमित क्या करना. एक भारी समस्या और थी, मुझे हिंदी टाइप करना नहीं आता है,  सो हमने गूगल की शरण ली और एक ट्रांसलिटरेशन सोफ्टवेयर डाऊनलोड कर लिया, इसकी सहायता से मैं रोमन में टाइप करके हिंदी में लिख पा रह हूँ. ट्रांसलिटरेशन कि अपनी सीमायें हैं कही कही अशुद्धियों कि गुंजाइश हमेशा रहती है.  गलतियाँ हो सकती हैं, लेकिन अर्थ का अनर्थ न हो इसका ख्याल रखूँगा.
इन सब के आलावा एक हिचक और भी है ...... वो ये कि मैं कोई पड़ा लिखा या प्रोफेसनल लेखक तो हूँ नहीं, हिंदी या और कोई साहित्य कभी मेरा मुख्य विषय तो रहा नहीं..... इंटर तक साइंस, ग्रेजुएसन में कॉमर्स और फिर कानून की पड़ाई की.. सो गलतियाँ होना अवश्यंभावी हैं .....पिछले १०-१५ वर्षों से रोटी पानी कि मजबूरी के चलते मुख्यतः अंग्रेजी में ही लिखते पड़ते रहना पडा है,  पहली बार पब्लिक डोमेन में हिंदी में लिखोगे....... लोग क्या कहेंगे..... फिर मैंने सोचा लोगों कि ऐसी तैसी ....... मैं केवल अपने सुकून के लिए लिख रहा हूँ जिसे समझ आये, अच्छा लगे वो पड़ें नहीं तो न पड़े .........सानू कि फर्क पेंदा है (मुझे क्या फर्क पड़ता है). बचपन से ही मुझे पड़ना लिखना अच्छा लगता रहा है. मध्यम चाहे जो भी रहा हो लेकिन अपने विचारों को व्यक्त करते रहना मुझे एक सुकून देता है. पिछले कुछ वर्षों से, खास तौर से जब से मैं दिल्ली आया हूँ मैं इस सुकून से मरहूम रहा हूँ. पिछले कुछ दिनों से जब से मैंने कुछ हिंदी ब्लोग पड़ने शुरू किये मुझे लगा कि ब्लॉग लेखन के जरिये मैं इस सुकून को फिर से पा सकूंगा. इसीलिये ये ब्लॉग ........
लेखक दो तरह के होते है – एक बहु जन हिताय- जो दूसरों के हित के लिए लिखते है और दूसरे स्व मन सुखाय. जो केवल अपने सुख के लिए लिखते है.....मैं दूसरी श्रेणी में आना चाहूँगा (अगर कोई मुझे लेखक माने तो)..... मैं केवल अपने लिए लिखना चाहता हूँ और कभी कभी केवल अपनो के लिए.......... मैं किसी दूसरे के लिए नहीं लिखूंगा ...... आप कह सकते है कि दूसरी श्रेणी के लेखक को तो डायरी लिखनी चाहिए जिसे कोई और न पड़े.....मैं  इससे सहमत नहीं ....लेखन होता ही है दूसरों के पड़ने के लिए ..... लिखने का मंतव्य ही है कि उसे लेखक के अलावा कोई और भी पड़े....... ( वर्ना लिखने कि कोई जरुरत ही नहीं ...) केवल सोच कर उसको अपनी याद के लिए रख लेना चिंतन तो हो सकता है लेखन नहीं.  लेखक चाहे किसी भी श्रेणी का हो लिखने के बाद उसके मन में ये जरुर आता है कि कोई उसके लिखे हुए को पड़े और सराहे या आलोचना करे  ........शायद इसीलिये ये ब्लॉग शुरू कर रहा हूँ कि मेरे लिखने के बाद कोई और भी इसको पड़ सके........ और हो सके तो उस पर अपनी प्रतिक्रिया दे सके ...........
क्या लिखूंगा? इसका मुझे खुद अभी पता नहीं ........ मैं किसी सीमा में नहीं बंधना चाहता .... मैं कोई सीमा बना भी तो नहीं सकता ........ क्योकि सीमाए तो वो बना सकता है जिसके पास प्रचुरता हो... या जिसके पास बहुत कुछ हो कहने और बताने के लिए ......... मुझे तो अभी ये भी नहीं पता कि मैं कितने दिन तक लिखूंगा ........या पिछले कुछ और संकल्पों कि तरह ये ब्लॉग लेखन का विचार भी कुछ दिनों में फ्लॉप हो जायेगा ........ कुछ भी, जो दिल में आयेगा लिखूंगा .... मेरे संस्मरण ....मेरे अनुभव ...... मेरे विचार.... मेरी राय या  .....टिप्पडी .....या वो सब कुछ जो मैं सोचता हू किसी व्यक्ति, घटना, पुस्तक, फ़िल्म या जगह के बारे में ... गध्य या पद्य, कविता और कहानिया ... खुद का सोचा और लिखा हुआ या फिर किसी और का लेखन जो मुझे अच्छा लगे और लगे कि लोगो को भी इसे पड़ना चाहिए.......  
एक पुरानी कहावत है  “दुविधा में दोऊ गए, ना माया मिली न राम” – ज्यादा समय तक दुविधा से ग्रस्त रहना अच्छा नहीं ..लेकिन ये भी सच है कि किसी भी निर्णय तक पहुचने से पहले दुविधा एक आवश्यक पड़ाव है. बिना इसे पार किये आप निर्णय नहीं कर सकते.  जहाँ कहीं भी विकल्प हैं या चुनाव का अवसर है वहाँ दुविधा है ..... दुविधा होना बुरा नहीं है अपितु दुविधा में पड़े रहना बुरा है ...... सो बिना किसी देरी के, दुविधा को तिलांजलि देते हुए हमने ये ठाना कि ब्लॉग लेखन किया जाये.
एक दुविधा खत्म हुई तो दूसरी दुविधा से पाला पड़ा, सो अब अगली दुबिधा थी कि ब्लॉग का शीर्षक क्या हो? अब ब्लॉग है तो कोई शीर्षक भी रखना पड़ेगा ...... आखिर कर अगर कोई पड़ने वाला मिला भी तो वो खोजेगा कैसे बिना शीर्षक के ..... हर एक ब्लॉग का कुछ न कुछ शीर्षक होता है .. जैसे आशियाना, नुक्ताचीनी, अनामदास, उन्मुक्त, प्रभात भारत, विस्फोट,वगैरह वगैरह हिंदी के लोकप्रिय ब्लोग्स के शीर्षक है कुछ लेखक अपने नाम से ही ब्लॉग लिखते हैं और उनकी ब्लॉग का शीर्षक भी उनका नाम ही होता हैं, लेकिन हम ये जोखिम नहीं उठा सकते क्योंकि के तो हमें कोई जानता नहीं दूसरा हमारा नाम इतना प्रचलित है कि कोई न कोई जरुर इस नाम से ब्लॉग लिख रहा होगा. सो हम भी किसी अजीब से लगने बाले शीर्षक कि खोज में यहाँ वहाँ ताकने झाकने लगे, इस उम्मीद में कि शायद कही से कुछ “प्रेरणा” मिल जाये.. स्टार प्लस के सीरिअल कसौटी वाली प्रेरणा से इतर .....  
पहले दिमाग में आया कि अपने ब्लॉग का शीर्षक भड़ासरख लिया जाये..... क्योकि ये कुछ नहीं बस मन कि एक भड़ास ही तो है .....जिसे निकालने के प्रयास में ये ब्लॉग लिख जा रहा है .... फिर सोचा कि भड़ास का अंग्रेजी अनुवाद तो frustration से मिलता जुलता होता है, जो शायद मेरे लेखन में कभी कभी ही मिले...लेकिन फिर भी अलग से दिखने वाले आकर्षक शीर्षक के लोभ का संवरण मैं नहीं करना चाहता था. जब ब्लागस्पाट  पर भड़ास शीर्षक डाला तो पता चला कि ये नाम उपलब्ध नहीं है .......... अजीब दुबिधा थी..... कि तभी मेरी नजर रवीश कुमार के ब्लॉग के शीर्षक कस्बापर पड़ी.  रवीश एक  जाने माने ख्यातिलब्ध पत्रकार है, फिर भी उन्होंने अपना ब्लॉग का शीर्षक अपने नाम से नहीं रखा .... उन्होंने अपने ब्लॉग का शीर्षक कस्बाको चुना जो उनके लेखन के केंद्र में कही कही आपको मिल ही जायेगा.
रवीश कुमार के बारे में कुछ जरुर कहना चाहूँगा, इसलिए विल्कुल भी नहीं कि किसी ख्यति प्राप्त व्यक्ति के विषय में चर्चा करके आप खुद चर्चा में सकते है, वल्कि इसलिए कि मैं उनका बहुत आदर करता हूँ और उनकी साफ़गोई, ईमानदारी, और आम आदमी से जुड़े मुद्दों को आम आदमी कि सहज सरल भाषा में उठाने के  उनके साहस का कायल हूँ .. एनडीटीवी पर उनकी रवीश कि रिपोर्टमशहूर थी... ऑफिस कि मज़बूरी के कारण आजकल स्टूडियो में प्राइम टाइमनामक बहस की एंकरिंग करते हैं.    वो सरकहने से चिड़ते हैं  और कोई दूसरा उन्हें देखकर या मिलकर प्रेरणा पाए  ये उन्हें अच्छा नहीं लगता... लेकिन हम तो साहब उनसे प्रभावित है .... ... अपने ब्लॉग के शीर्षक का आईडिया तो उनके ब्लॉग को पड़कर ही मिला ..... क्या कर सकते है ....आप किससे प्रभावित / प्रेरित हो जायेंगे इस पर आपका कोई वश नहीं होता ... और जिससे प्रेरणा मिलती है शायद उसका भी कोई वश नहीं होता होगा ...पता नहीं उन्हें कैसा लगेगा ..पता नहीं पता भी लगेगा या नहीं.....खैर कुछ भी हो ....सानू की (मुझे क्या )  .......


रवीश कुमार के ‘कस्बा’ से मुझे पता पड़ा कि ब्लॉग का शीर्षक ऐसा होना चाहिए जो आपके लेखन कि आत्मा को परिलक्षित करता हो ........ सो काफी सोंच विचार और अपने आम आदमी होने कि औकात को ध्यान में रखते हुए मुझे लगा कि हमारे ब्लॉग का सबसे उपयुक्त शीर्षक “दुविधा“ ही रहेगा. आम आदमी तो अक्सर दुविधा में ही रहता है चाहे फिर वो दुविधा ‘सर्फ़ एक्सेल’ या ‘सुपर रिन’ में से एक को चुनने की हो या फिर बच्चों का दाखिला पास के कम फीस वाले स्कूल में कराने  या दूर के ज्यादा फीस बाले पब्लिक स्कूल में कराने कि दुविधा हो, आम आदमी का जीवन तो दुविधा से शुरू होता है और दुविधा में ही गुजर जाता है.
हम सभी अपने दिन प्रतिदिन के काम काज में अक्सर किसी न किसी दुविधा से दो चार होते रहते है..... ऐसा नहीं की केवल अधिकता या बहुविकल्पिता होने पर ही दुविधा होती हो.... जिनके पास कोई विकल्प नहीं होता उनकी अपनी दुविधा होती है.... लेकिन शायद वो दुविधा कम मज़बूरी ज्यादा होती होगी... आम आदमी के जीवन कि दुविधा पूर्ण झाकी का विश्लेषण करने बैठू तो ये ब्लॉग नहीं उपन्यास बन जायेगा....... इसलिए अभी इतना ही ..... आगे दूसरी दुविधाओ पर जूझते रहेंगे .........दुविधा भरी इस ब्लॉग पर मिलेंगे, फिर कभी ........
अमित    

लिखने के बाद के ख्याल:
( इतना लिखने/ टाइप करने के बाद एक और दुविधा में फंस गया हूँ, कि लिख तो गया है लेकिन पोस्ट करूँ या नहीं, क्या ये इस लायक भी है कि इसे ब्लॉग पर पोस्ट किया जाये, क्या कोई इसे पड़ेगा भी ....भला किसी को इसमे क्या रूचि होगी कि अमित जैन अपना ब्लॉग शुरू करने से पहले किस दुविधा से गुजरा होगा? सोचता हूँ कि पोस्ट कर ही दूँ ....... कम से कम मित्रों को अनुरोध कर सकूंगा पड़ने के लिए ...... इस बहाने उन्हें ये बताने का मौका भी मिल जायेगा कि जैन साहेब अब भी हिंदी लिख सकते है... ).

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